जाँबाज़ हिंदुस्तान के

चल देते हैं उस पथरीली राह पर,गली-चौराहे से नाता तोड़ कर।किया वादा माटी का साथ निभाने को,रिश्ते बाकी सारे घर पर छोड़ कर।सह जाते धूप, ताप, शीत, वर्षा,भुजाओं को अपनी मोड़ कर।हर लेते अंधेरी काली दिशाओं को,हिम्मत साहस वे अपनी जोड़ कर।चाल सभी नाकाम कर देते दुश्मन की,मजबूत इरादे से

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महबूब की ‘ग़ज़ल’

डगमगाते डगों से वो‌ नापती डगरकभी गिरती, कभी संभलती पर चलती मगर कोहनी उसकी अक्सर जाती है छिलघुटने उसके हरदम जाते हैं रगड़ मंजिल उसकी उस ओर ही सरक आतीअपने नन्हे-नन्हे पाँव वो बढ़ाती जिधर मुस्कुरा देती है वो जिस ओर मुँह करकेफूल खिल आते हैं वहाँ देखो उधर गिरी

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