मन का रेडियो, बजने दे ज़रा: विश्व रेडियो दिवस

स्मार्टफोन के आने से पहले की पीढ़ी, सम्भवतः वह आखिरी थी, जिसने रेडियो को घरों का अहम हिस्सा बनते देखा। रविवार को फ़ुर्सत से बैठकर लोग रेडियो पर ख़बरें सुनते, गाने गुनगुनाते। आज तो बच्चे यह कल्पना भी नहीं कर पाएँगे कि एक दौर ऐसा भी था, जब रेडियो ही

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आभासी दुनिया का शिकार होते बच्चे

बच्चे भविष्य की नींव है और भविष्य इस बात पर ही निर्भर करता है कि आज बच्चों का मानसिक, शारीरिक, सामाजिक विकास कैसा है? आज हर घर में बच्चे को जो सिखाया जाएगा, अपनी युवावस्था में वह उसी परम्परा को वह आगे बढ़ाएगा। यदि बच्चों को एक अच्छा परिवेश दिया

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आज़ादी का अमृत महोत्सव: क्या खोया, क्या पाया हमने

आज जब हम आज़ादी की खुली हवा में साँस ले रहे हैं, हमें इसका सम्मान करते हुए यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यहाँ तक का सफ़र कैसा था। आदिकाल में भारतवर्ष अध्यात्म, शिक्षा, शासन के रूप में सम्पूर्ण विश्व का केंद्र था, जिसने सम्पूर्ण विश्व को लोकतंत्र का पाठ

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‘क’ से कर्ण, ‘क’ से कृष्ण

जीवन की प्रकृति ही ऐसी है कि व्यक्ति के लिए बिना मित्र के रह पाना कठिन है। कई बार परिवार में मित्र ढूँढना पड़ता है, कई बार मित्र ही परिवार हो जाते हैं…

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‘दलित’ के घर में नेताजी

आज हम सभी को पता है कि समाज में क्या गलत हो रहा है पर हम चुप हैं, क्यों? क्योंकि हमें लगता है कि मेरे अकेले के करने से क्या हो जाएगा?

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